धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक: आज से शुरू हो रहा है चार दिवसीय ‘रज पर्व’महाराज क्षेत्रपाल देवता

सनातन धर्म और लोक संस्कृति में प्रकृति और मातृशक्ति की आराधना का विशेष महत्व है। इसी कड़ी में 14 जून से चार दिवसीय पावन ‘रज पर्व’ (रजस्वला उत्सव) की शुरुआत होने जा रही है। धरती माता के रजस्वला स्वरूप और मातृत्व के सम्मान से जुड़ा यह पर्व आगामी 17 जून तक पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।
इस विषय पर जानकारी साझा करते हुए पूज्य क्षेत्रपाल देवता महाराज जी ने इस पर्व की तिथियों और धार्मिक नियमों के बारे में विस्तार से बताया है।
चार दिनों का विशेष कार्यक्रम और तिथियां शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार इस चार दिवसीय उत्सव की तिथियां इस प्रकार तय की गई हैं:
प्रथम रज:14 जून 2026, रविवार (आज प्रकृति के इस विशेष स्वरूप की शुरुआत हो चुकी है)।
रज संक्रांति: 15 जून 2026, सोमवार (कल मुख्य संक्रांति का दिन होगा)।
भूमि दहन:16 जून 2026, मंगलवार।
वसुमति स्नान: 17 जून 2026, बुधवार (इस दिन पवित्र स्नान के साथ पर्व का समापन होगा)।
पर्व के दौरान बरतें यह विशेष सावधानियां
महाराज जी ने श्रद्धालुओं के लिए कुछ विशेष नियम और दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं, जिनका पालन करना हर परिवार के लिए आवश्यक माना गया है:
स्त्रियों के लिए नियम: रजस्वला काल के दौरान स्त्रियों का पूजा-पाठ, मंदिर और पूजन कक्ष (पूजा घर) में प्रवेश पूरी तरह से वर्जित रहेगा। इस दौरान उन्हें पूरी तरह से विश्राम करना चाहिए।
पुरुषों की जिम्मेदारी. महाराज जी ने संदेश दिया है कि चूंकि इस अवधि में महिलाएं पूजन कार्य नहीं कर सकेंगी, इसलिए घर के पुरुषों को आगे आना चाहिए। इस दौरान पुरुषों द्वारा ही घर में सुबह-शाम दिया-बत्ती (दीपक जलाना) और नियमित पूजा-पाठ संपन्न किया जाना चाहिए ताकि घर की आध्यात्मिक ऊर्जा बनी रहे
यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति, भूमि और नारी शक्ति के हर स्वरूप का सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर पूर्वी भारत में धरती माता की पूजा की जाती है और कृषि कार्यों पर भी कुछ दिनों के लिए रोक रहती है।


