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शिक्षाकर्मियों की पेंशन पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, राज्य सरकार की अपील खारिज, नीति पर दोबारा विचार के निर्देश बरकरार

High Court's major ruling on pension for *Shiksha Karmis* (education workers): State government's appeal dismissed, directive to reconsider the policy upheld.

 छत्तीसगढ़ :  हजारों शिक्षक एल.बी. संवर्ग के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पेंशन पात्रता से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार की रिट अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिंगल बेंच ने सरकार के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दिया था, बल्कि एक जिम्मेदार और आदर्श नियोक्ता की भूमिका निभाने के लिए नीति पर पुनर्विचार का अवसर दिया था।

क्या है पूरा विवाद, क्यों पहुंचे थे शिक्षक हाई कोर्ट?

यह मामला व्याख्याता एल.बी. परमेश्वर प्रसाद जायसवाल सहित अन्य शिक्षकों की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने वर्षों तक शिक्षाकर्मी के रूप में सेवाएं दीं और बाद में 1 जुलाई 2018 को उनका स्कूल शिक्षा विभाग में नियमित समावेशन हुआ।

मौजूदा सरकारी व्यवस्था के तहत पेंशन के लिए आवश्यक 10 वर्ष की सेवा की गणना समावेशन की तिथि यानी 1 जुलाई 2018 से की जा रही थी। इसके चलते लंबे समय तक सेवाएं देने के बावजूद शिक्षक 2028 से पहले पेंशन के पात्र नहीं बन पा रहे थे। इसी निर्णय को चुनौती देते हुए उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सिंगल बेंच ने सरकार को दिया था नीति बनाने का सुझाव

23 जनवरी 2026 को सिंगल बेंच ने मामले का निपटारा करते हुए सीधे पेंशन देने का आदेश नहीं दिया था। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह शिक्षाकर्मियों की पूर्व सेवा को पेंशन के लिए किस सीमा तक जोड़ा जा सकता है, इस पर समानता, पारदर्शिता और न्यायसंगत सिद्धांतों के आधार पर स्पष्ट नीति तैयार करे।

सिंगल बेंच ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि पेंशन एक सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी व्यवस्था है। ऐसे में समावेशन से पहले दी गई लंबी सेवा को पूरी तरह नजरअंदाज करना उचित नहीं माना जा सकता।

सरकार की दलील नहीं मानी, हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

राज्य सरकार ने सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि यह पहले से तय विषय को दोबारा खोलने जैसा है। हालांकि डिवीजन बेंच ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने कहा कि सिंगल बेंच ने न तो किसी नीति में बदलाव किया और न ही सीधे पेंशन देने का आदेश पारित किया। अदालत ने केवल सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया, जो पूरी तरह न्यायोचित और विधिसम्मत है।

हाई कोर्ट की टिप्पणी से सरकार को स्पष्ट संदेश

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि यह केवल कुछ कर्मचारियों का मामला नहीं है, बल्कि कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। इस तरह के मामलों में बार-बार मुकदमेबाजी हो रही है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित होती है।

अदालत ने कहा कि यदि राज्य सरकार इस मुद्दे पर स्पष्ट, तर्कसंगत और पारदर्शी नीति तैयार करती है तो इससे प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ेगी और भविष्य में अनावश्यक विवादों से भी बचा जा सकेगा।

हजारों शिक्षकों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर

हाई कोर्ट द्वारा राज्य सरकार की अपील खारिज किए जाने के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार शिक्षाकर्मियों की पूर्व सेवा को पेंशन पात्रता में शामिल करने को लेकर नई नीति कब और किस स्वरूप में तैयार करती है। यह फैसला प्रदेश के बड़ी संख्या में एल.बी. संवर्ग के शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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