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बिना नोटिस और सुनवाई नौकरी से हटाना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति आदेश किया रद्द, 45 दिन में वेतन और आर्थिक लाभ देने के निर्देश

Dismissal from service without notice or hearing proves costly; High Court quashes termination order and directs payment of salary and financial benefits within 45 days.

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी को बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और अपना पक्ष रखने का अवसर दिए सेवा से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। अदालत ने ग्राम रोजगार सहायक की सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को 45 दिनों के भीतर वेतन सहित अन्य आर्थिक लाभ देने के निर्देश दिए हैं।

ग्राम रोजगार सहायक ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

मामला बिलासपुर जिले के तखतपुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत जरौंधा में पदस्थ ग्राम रोजगार सहायक नीता बाई डाहीरे से जुड़ा है। उन पर कथित अनियमितता और फर्जी मस्टर रोल तैयार करने के आरोप लगाते हुए सेवा से हटा दिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ता ने बताई कार्रवाई में गंभीर खामी

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक ने अदालत को बताया कि सेवा समाप्त करने से पहले न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही कोई सुनवाई की गई। इतना ही नहीं, सेवा समाप्ति के लगभग तीन महीने बाद नोटिस जारी किया गया, जिससे पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।

राज्य का पक्ष सुनने के बाद अदालत ने सुनाया अहम फैसला

सुनवाई के दौरान राज्य शासन और जनपद पंचायत तखतपुर की ओर से कार्रवाई को उचित ठहराने की कोशिश की गई। हालांकि अदालत ने पाया कि सेवा समाप्ति का आदेश कर्मचारी की छवि को प्रभावित करने वाला था। ऐसे मामलों में किसी भी कर्मचारी को पहले अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर देना कानूनन जरूरी है।

प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना की गई कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई वैध नहीं मानी जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को बिना सुनवाई नौकरी से हटाना उसके कानूनी अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

45 दिन में वेतन और अन्य लाभ देने का आदेश

हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति का आदेश रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को निर्धारित अवधि का वेतन और अन्य आर्थिक लाभ 45 दिनों के भीतर उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही अदालत ने जनपद पंचायत को यह छूट भी दी कि यदि आवश्यक हो तो कानून के अनुरूप पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

संविदा कर्मचारियों के अधिकारों के लिए बना अहम फैसला

कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल एक कर्मचारी को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में बिना सुनवाई या निर्धारित प्रक्रिया अपनाए सेवा समाप्त करने जैसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। यह निर्णय प्रशासनिक संस्थाओं को स्पष्ट संदेश देता है कि किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई में नियमों, पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।

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