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13 साल पुराने चर्चित अपहरण-हत्या केस में नया मोड़… हाई कोर्ट से बरी आरोपी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा पीड़ित परिवार

New twist in high-profile 13-year-old kidnapping and murder case... Victim's family moves Supreme Court against accused acquitted by High Court.

 बिलासपुर। कोरबा के बहुचर्चित अपहरण और हत्या मामले ने एक बार फिर कानूनी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। करीब 13 वर्ष पुराने इस संवेदनशील प्रकरण में अब पीड़ित पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। परिवार ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, राज्य सरकार से मांगा जवाब

मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने राज्य सरकार सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं और इसके लिए चार सप्ताह का समय प्रदान किया है।साथ ही पीड़ित पक्ष द्वारा देरी से दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को भी मानवीय आधार पर स्वीकार कर लिया गया है।

6 साल के मासूम के अपहरण और हत्या से दहल गया था कोरबा

यह मामला वर्ष 2013 का है, जब कोरबा जिले के 6 वर्षीय भूपेश उर्फ अप्पू के लापता होने की रिपोर्ट उरगा थाने में दर्ज कराई गई थी। अगले ही दिन बच्चे के परिजनों को फोन कर 10 लाख रुपये की फिरौती मांगी गई।पुलिस जांच के दौरान कॉल डिटेल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी अरुण कुमार वैष्णव को गिरफ्तार किया गया। जांच में आरोप सामने आया कि आर्थिक तंगी और परिवार को निशाना बनाने की मंशा से बच्चे का अपहरण किया गया था। बाद में उसकी हत्या कर शव को एक कमरे में छिपा दिया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा

मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को अपहरण, फिरौती, हत्या और साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने विभिन्न धाराओं के तहत अलग-अलग सजाएं और जुर्माना भी लगाया था।

हाई कोर्ट ने कहा- परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी

आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा है।

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि जांच प्रक्रिया में कई गंभीर खामियां रही हैं। शव बरामदगी, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, फिरौती कॉल और अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों को लेकर अभियोजन पक्ष पर्याप्त प्रमाण नहीं दे सका। अदालत ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं हो सकी, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।इसी आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।

अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा अंतिम कानूनी दिशा

हाई कोर्ट से आरोपी के बरी होने के बाद पीड़ित परिवार ने फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की है। शीर्ष अदालत द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब मामले की कानूनी लड़ाई नए चरण में पहुंच गई है।आने वाली सुनवाई में राज्य सरकार और अन्य पक्षों के जवाब के आधार पर यह तय होगा कि हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाएगा या मामले में आगे कोई नया कानूनी मोड़ आएगा।कोरबा का यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि इसमें एक मासूम के अपहरण, फिरौती और हत्या जैसे गंभीर आरोपों के बीच ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसले पूरी तरह अलग रहे हैं। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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