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पंचायत चुनाव विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, बिना गवाही और ट्रायल के याचिका खारिज करना गलत

High Court's major ruling on the panchayat election dispute: Dismissing the petition without testimony or a trial is incorrect.

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि चुनाव न्यायाधिकरण किसी चुनाव याचिका में विवाद के बिंदु तय कर चुका है, तो उसके बाद दोनों पक्षों की गवाही और साक्ष्य लिए बिना याचिका को बंद नहीं किया जा सकता। ऐसा करना कानूनी प्रक्रिया के विपरीत माना जाएगा।

एसडीएम का आदेश हाई कोर्ट ने किया रद्द

यह मामला बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के कसडोल ब्लॉक की ग्राम पंचायत हसुवा से जुड़ा है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस A.K. Prasad की एकलपीठ ने एसडीएम एवं चुनाव न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया।

अदालत ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित एसडीएम कोर्ट को भेजते हुए 60 दिनों के भीतर साक्ष्य दर्ज कर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

सरपंच चुनाव परिणाम को दी गई थी चुनौती

वर्ष 2025 में हुए पंचायत चुनाव में गायत्री शर्मा और रितु अतुल केशरवानी सरपंच पद की उम्मीदवार थीं। मतगणना के बाद रितु केशरवानी को विजयी घोषित किया गया था।

चुनाव परिणाम से असंतुष्ट गायत्री शर्मा ने छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 की धारा 122 के तहत चुनाव याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचित सरपंच ने नामांकन पत्र में स्वयं हस्ताक्षर नहीं किए थे, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे, जो भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।

हस्ताक्षर जांच की मांग पर उठा विवाद

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत आवेदन देकर विवादित हस्ताक्षरों की जांच हैंडराइटिंग विशेषज्ञ से कराने की मांग की थी। आवेदन में जांच का खर्च स्वयं वहन करने की भी बात कही गई थी।

इसी बीच एसडीएम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 को आदेश जारी कर चुनाव याचिका की सुनवाई बंद कर दी। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने बताई चुनाव न्यायाधिकरण की जिम्मेदारी

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुनील साहू ने दलील दी कि एसडीएम का आदेश छत्तीसगढ़ पंचायत (निर्वाचन याचिका, भ्रष्ट आचरण और सदस्यता के लिए अयोग्यता) नियम, 1995 के नियम 11 और 12 का उल्लंघन है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव याचिका की सुनवाई सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के अनुरूप एक दीवानी वाद की तरह की जानी चाहिए। जब एक बार विवाद के बिंदु तय हो जाते हैं, तब न्यायाधिकरण का दायित्व है कि वह दोनों पक्षों को गवाह और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दे।

सिर्फ एक आवेदन खारिज कर पूरी याचिका बंद नहीं की जा सकती

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब मामला साक्ष्य के चरण तक पहुंच चुका था, तब केवल धारा 45 के आवेदन को खारिज करने के आधार पर पूरी चुनाव याचिका समाप्त करना उचित नहीं था।

अदालत ने इसे स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में दोनों पक्षों को अपनी बात रखने और साक्ष्य पेश करने का अवसर मिलना अनिवार्य है।

60 दिनों में फिर होगी सुनवाई

हाई कोर्ट ने मामले को वापस एसडीएम कोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया है कि दोनों पक्षों की गवाही और साक्ष्य दर्ज किए जाएं तथा 60 दिनों के भीतर मामले का अंतिम निराकरण किया जाए।

इस फैसले को पंचायत चुनाव विवादों की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है, जिससे भविष्य में चुनाव याचिकाओं के निपटारे की प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी तथा न्यायसंगत हो सकेगी।

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